मंगलवार, 6 दिसंबर 2016


जाड़े की धूप को चेहरे पर महसूसना;
स्नेही को
भर अँकवार समेट लेने की
असफल सी कोशिश
या
मन के प्याले में
ख़ुशी के जाम
का छलक जाना है।

डॉ आशुतोष राय

ठंढ की अलसाई सी सुबह में,
धूप की नर्मी
और लिहाफ की गरमाई में
भोर की उजास सा मन में भरता;
कोई धीरे से कान में
एक मल्हार तान छेड़ता;
'मैं' की सत्ता से अलग हो
सबमे समाहित सबकुछ समाहित
समिधा बन जाने का स्वप्न
है राग प्यार भरता।।।

डॉ. आशुतोष राय

माँ के लिए-

माँ, सुनता हूँ तुम सुंदर थी।
पर देखी नही तुम्हारी सुंदरता
सिवाय
हथेलियों पर उभर आई
बर्तन के खुरदरेपन के
या
धुँधुवाते चौके से मुँदी तुम्हारी आँखों के।
माँ, तुम गाती भी हो?
कभी सुना नही तुम्हारा गाना
सिवाय लोरी के
जो मुझे सुलाने के लिए गाती थी।
माँ, तुम सोती भी हो?
कभी देखा नही,
जब भी आँख खुली
तुम्हे जगा पाया।
माँ, तुमने अपने लिए कभी जिया?
या मुझे ही सौंप दिया खुद को?
माँ, 'मैं कृतज्ञ हूँ तुम्हारा' कहना अलम् होगा
या अपमान होगा तुम्हारा?
साँसों का हिसाब नही रखा जाता
न तो कृतज्ञ हुआ जाता है।
माँ,
तुम मेरी साँस हो।

-डॉ. आशुतोष राय
जब शाम का सूरज
टाँक रहा होता है पश्चिम में एक चित्र
 खूब धूसर और चटक लाल रंग से,
 जब धूप थके पाँव
लौटने लगती है घर को,
जब आकाश थोड़ा नरम होकर
फैला लेता है अपनी बाहें
और धुंधलका
उसके बाहों के गिरफ्त से छूटकर
फैल जाती है पूरी धरती पर,
हवा साँस थामकर
अगवानी करता है उसका;
धुंधलका घुलने लगती है
 रात में
धीरे-धीरे-धीरे......
तब तुम लगती हो मुझे पूरी धरती
जो समेट रही होती है
उस रात की पूरी महक को,
चांदनी के खुले धवल बाल को,
तारों की अनचीन्ही टिमटिमाहट को;
और तुममें
महसूसता हूं मैं
प्रेम की आदिम गंध
अपने देह- तन-मन-प्राण में।।।।

क्षणिका

मैंने बस एक नाम लिया
ईश्वर ;
वह बिखर उठा
चाँद में चांदनी बनकर
सूरज में रौशनी बनकर
सितारों में टिमटिमाहट बनकर
और घिर गया मै
उसके निर्मल आशीष में
प्राण में संवेदना बनकर।

क्षणिका

मैंने कहा 'शब्द'
तुमने लिखा 'सांस'
मैंने कहा 'अर्थ'
तुमने लिखा 'प्राण'
मैंने कहा 'कविता'
तुमने लिखा 'जीवन'
फिर तुमने पूछा 'रचना' ?
मैंने लिखा "तुम''।।।।।
एक क्षणिका--

शाम
घोलती है खुद को
रात के अंधेरों में
ताकि घुला सके
अपनी आभा
उषा की लालिमा में;
घुलकर ही
पाती है स्वयं को
एक नए विस्तार में।।।।
मैं लिखना चाहता हूं
पहाड़ नदियां ताल पोखर
जंगल नदी मैदान
धूप गर्मी बारिश
गुनगुनी ठंड सब कुछ,
पर समेट नहीं पाता हूं खुद में
शब्द होने की सीमा में
बेबस हो जाता हूं मैं ,
ईश्वरत्व के अनंत फैलाव को
क्षुद्र 'मैं' में साधना असंभव हो जाता है।
तब मैं स्वयं ईश्वर
होने की सोचता हूँ,
खुद को देकर
खुद को पाने की कोशिश करता हूँ;
धीरे धीरे  समाने लगती है मुझमे
पहाड़ों की गूंज
नदियों की इठलाती बलखाती लहरें
ताल-पोखर में जलमुर्गियों की फुदकी
कड़ी धूप की एक अदद छाँव
बारिश को खुले मैदान में चेहरे पर महसूसना
गुनगुनी ठंढ की नरम तासीर...
अब मैं ईश्वर ही न रहा,
सब कुछ हो गया;
मैं एक था
अब बहुत हो गया।।।।।

-आशुतोष राय
भोर के प्राची की
अनोखी अरुणाभ रेखा,
उधर विपरीत में
सहमी -सकुचाई,
झिलमिली धुंधलके का घूंघट डाले
कंचनजंगा।
उसे देखना जैसे
कोई नवोढ़ा वधू बैठी हो
प्रथम परस के
और घूंघट-पट खुलने के इंतज़ार में
हल्का संकोच और रोमांच भरे।
रवि का प्राची में
थोड़ा और ऊपर चढ़ना-
कि जैसे पूरी पूरब दिशा
खिंच गयी हो लाल पट्टी सी..।
थोड़ा और ऊपर-
अरुण क्षितिज के ऊपर से झांकता-
जैसे दहकते लाल भट्ठी से
उतर रहा हो स्वर्ण-गोलक,
या जैसे दूल्हे की बेचैन आँखे
हेर रही हो अपनी
दुल्हन की एक झलक को।
उधर कंचनजंगा के मांग में
भर रहा था वो सिंदूर;
राग और लज्जा से सिमटकर
वो होती जा रही थी और स्वर्णिम-
चोटी का माथा कंचन हो गया था।
अब सूरज चढ़ आया था ऊपर
अपनी रश्मियों के साथ,
उधर सुहाग से मदमाती
कंचनजंगा भी
हिम धवल श्वेत वसन पहने
निहाल थी अपने
अरुण-सुहाग को पाकर।।।।
कभी सोचा है
कितना असम्भव सा होता है
कोलकाता की गलियों में घूमते
नरेन के बचपन का
योद्धा संन्यासी विवेकानंद में बदलना?
पर बदला वह
साथ ही युग भी बदला
क्योंकि उस कच्चे घड़े को
हलके हलके थापा था
कालीबाड़ी के पुजारी ने,
उस निर्धन ब्राह्मण ने देखा था उसमे
एक नए भारत को जागते हुए
नया भारत नए योद्धा में ही साकार होगा।
उसने भी रौंद डाला पूरा भारत
और पूरा विश्व भी
अपने ज्ञान और तपःतेज से
एक योद्धा संन्यासी की तरह।
पुरखों की थाती को
थहाया था उसने,
बहुत गहरे डूब कर
समोया था खुद में
पूर्वजों का आशीर्वाद ।
काल प्रवाह को कर दिया था
स्वयं-मय।
वो आज भी है जीवित, पूजित, देवतुल्य..
पर ना, मैं नही चाहता उसे
देवता बनाना,
देवत्व दूर कर देगा उसे
मुझसे, तुमसे, हम सबसे
पूज्य बनकर पत्थर बन जायेगा नरेंद्र;
नर-इंद्र ही बना रहे वो,
आदमी की नस्ल में वो
मेरे और पास होगा,
मुझमे भरेगा विश्वास
दूसरा नर-इंद्र बनने का।
आज भी शून्य से निहार रहा है वो हमे
तलाश रहा है
दूसरे नर-इंद्र को,
एक और विश्व-विजय को।।।

-आशुतोष राय
ताल का पानी
बसा नैनो में पिया का अक्स
बादल - कि जैसे उतर पड़ा हो गलबहियां करने को
अपनी दुल्हनिया से।
उधर ताल
लहरों के चप्पू चलाकर
खे रहा है
अपने यौवन को
प्रिय के सुहाग में मदमाती सी
किनारे खड़े पेड़ों की चुहल पर
लजाती शर्माती
खुद में सिमट जाती,
पाकर बादलों की छाँव
भंवर बनकर
फ़ैल जाती किनारे तक;
पाकर तट कूल का कन्धा
टिका कर अपना श्लथ देह भार
खींच लेती है बादलों को
अपने देह पर...
और निहाल हो जाता है बादल
इस अनकही, अनछुई
तप्त प्रेम का परस पाकर....।।।

-डॉ आशुतोष राय
गीदड़ों और सियारों की हुआँ हुआँ
और कुत्तों की रुदन के बीच
मुँह चिढ़ाते लाल दस्तरख्वान पर
सफ़ेद कबूतरी आत्माएँ
परों से अपनी विष्ठा को दबाये
शांति का संदेश सुनाएंगी
और हम नाक पर रुमाल धरे
तालियों की गड़गड़ाहट में
अपने पुंसत्व को परवान चढ़ाएंगे।
समाजवादी, राष्ट्रवादी, वामपंथी
रंगबिरंगी चित्तियों से सजे
जोशीले नारों से टँके सलमा सितारों वाली
खूब बड़ी से लहालोट चद्दर से
ढक दिया जायेगा 'शातिर' जनता को,
मुर्दा श्वास सी चलती
प्रतिरोधी आवाजें,
शांति-सन्देश में
तालियों की गड़गड़ाहट में
औ' लहालोट चद्दर में
जिबह किए जाते मेमने सी
गोगियाते हुए दम तोड़ेंगी।
और मैं,
कहीं बंद सीलन भरे अँधेरे में
लिख रहा होऊंगा क्रांति के गीत
कलम की सूखती रोशनाई से।।

-आशुतोष राय
मुझे प्यार है अपनी कलम की रोशनाई से
आड़ी-बेड़ी रेखाओं से टँकी
कागजी पृष्ठों के तई
मैं देखता हूं नई दुनिया को;
झिलमिलाती, तारों टँकी आकाश के पार-
जहाँ अन्तस् का बहुत कोमल स्पर्श
दुलरा रहा होता है 'मैं' को।
भाव और भाषा के द्वैत में
अद्वैत को साधना -
शब्द घुलता है मेरे रूह में
जैसे श्वास घुलती है पूरे जिस्म में,
अर्थ छिटक जाती है मुझसे
जैसे खिलंदड़ी बच्चा
अचकचाकर छूट जाये हाथ से
मैं डरूँ औ' वो सामने खड़ा हो खिलखिलाये;
पर हर बार शब्द सहेजता है मुझे
थपकाकर, पुचकारकर और मेरा हाथ बनकर
फिर से लाती है उन अर्थ को
मुझतक खुद में समेटकर-
जैसे मेरे मंदिर के
शालिग्राम का चरणोदक
भर माथे लगाकर
कृतकृत्य हो जाता हूँ मैं।
ऐसे , शब्दों में
प्राणों को उलीचकर
रेखाओं- प्रतीकों के तई
अक्षर ब्रह्म तक पहुँचने की
कोशिश करता हूँ मैं।
इसलिए
साधता हूँ मैं शब्दों को
और हौले-हौले
 भरता जाता है मेरा हृदय
बेपनाह मोहब्बत से
अपनी कविता से।।।।

-आशुतोष राय
कहीं बहुत दूर
जंगल के उस पार
कांपती हुई क्षितिज में
डूब रही होती है मेरी नज़र,
ख्यालों के जंगल में
अँधेरे की पगडंडियां पकड़े
चल रहा होता हूँ मैं,
जंगल के बियाबान में
नर्म पत्तों की खामोश आवाजें
जाने क्या तो
हल्का सा खुरच जाती है दिल में,
बरसाती नदियां उलीचती है
अपने पाट का पानी:
मेरी आँखों से फूट पड़ते है सोते
औ' भींग जाता है मेरा पूरा अन्तस्;
तब सुरमई शाम औ'
सुनहले भोर का सपना तराशे
थकी आँखों के कोरों में
अटक जाती हो तुम
जैसे
टँक जाता है सूरज
पूरब में
पूरे लाल रंग के साथ....।

-आशुतोष राय
लिखकर एक आखर
पाता हूँ मैं एक आश्वस्ति
जैसे एक कसक निकल सी गयी हो,
थोड़ा सा भर जाता हूँ मैं
पूरेपन से
पाकर सटीक शब्द
अपने उफनते भाव के लिए,
लड़खड़ाते, बलखाते शब्द
गुथते चले जाते है वाक्य में-
जैसे छोटा बच्चा
पकड़कर मेरी तर्जनी
ठुमकता चलता हो
पूरे जमीन को
अपने पद-तल से दबाये,
शब्द बनते है पद
और पद से रिसता है
पदार्थ
जैसे गन्ने से रिसती है
उसकी मिठास
जैसे भोर प्राची से
छिटकती है उजास!
लिखकर एक छोटी सी कविता
निहाल हो जाता हूँ मैं
पा लेता हूँ खुद को
खुद में-
जीवन का एक दिन सफल हो जाता है...।

-आशुतोष राय
कविते!
साधूँगा मैं तुम्हे;
शब्दों की समिधा को
लेखनी के स्रुवा में भर
पृष्ठों की वेदिका में
अर्पित करूँगा
और अर्थ का हविष्य बनाकर
करूँगा आह्वान
अक्षर-ब्रह्म का।
ध्वनि-मन्त्र विस्तरित होंगे मेरे
वायुपुत्रों के माध्यम से
स्फोट होगा
पूर्ण परात्पर अक्षर का
महदर्थ विस्तार में।
पद-मंत्र
उद्गिरित होंगे होता के मुख से-
परा से पश्यंती तक
पश्यंती से मध्यमा तक
और
मध्यमा से बैखरी तक।
इस सृजन यज्ञ का देवभाग
समर्पित है तुम्हे
सँभालो
इस मंत्र-पूत
अग्नि-स्तवित
पूर्ण परात्पर के अनुग्रह को-
मेरी कविता को....।।।

-आशुतोष राय
ऐसी ख़ुशी मन की-

बूँद की सिहरन;
कि जैसे तुम्हारी छुअन का कम्प
मानो दहकते सूर्य को समेटे
बादल का टुकड़ा।
धुले पत्ते की चमक;
तुम्हारे चेहरे से बिछलती आँखों की शीतलता
मानो अन्तर की चट्टान पर गिरती
झरने की धार।
मिट्टी की सोंधी गमक;
मानो तुम्हारे होने की गंध
जैसे जिस्म की गंध हवा में
तार तार उड़ी जाती हो।
इन फुहारों की ख़ुशी को समेटना;
जैसे तुम्हे पूरा पाने की कोशिश
पर हर बार जैसे
कुछ छूट छूट सा जाता है।
बादलों का गरजना;
वक सुप्त सा भय
कि जैसे दूर घाटियों में गूंजती आवाज़े
पास...
होकर भी बहुत दूर
तुम्हारी आवाज़ का दूर....दूरतर होते जाना।
तुम्हारे मन की किलकन;
जैसे नदी तालो में जलपक्षियों की फुदकी,
या कि जैसे बालमन की
खेतों, आँगन की छपछप-
ऐसी ख़ुशी मन की।।।
ऐसी ख़ुशी मन की-

बूँद की सिहरन;
कि जैसे तुम्हारी छुअन का कम्प
मानो दहकते सूर्य को समेटे
बादल का टुकड़ा।
धुले पत्ते की चमक;
तुम्हारे चेहरे से बिछलती आँखों की शीतलता
मानो अन्तर की चट्टान पर गिरती
झरने की धार।
मिट्टी की सोंधी गमक;
मानो तुम्हारे होने की गंध
जैसे जिस्म की गंध हवा में
तार तार उड़ी जाती हो।
इन फुहारों की ख़ुशी को समेटना;
जैसे तुम्हे पूरा पाने की कोशिश
पर हर बार जैसे
कुछ छूट छूट सा जाता है।
बादलों का गरजना;
वक सुप्त सा भय
कि जैसे दूर घाटियों में गूंजती आवाज़े
पास...
होकर भी बहुत दूर
तुम्हारी आवाज़ का दूर....दूरतर होते जाना।
तुम्हारे मन की किलकन;
जैसे नदी तालो में जलपक्षियों की फुदकी,
या कि जैसे बालमन की
खेतों, आँगन की छपछप-
ऐसी ख़ुशी मन की।।।
कभी देखी है
बच्चे की दुधमुही मुस्कान?
मासूम सी होठों की थिरकन में
घुली होती है जिंदगी की मिठास,
 बंद मुट्ठियों में भरे होता है
वह पूरा आसमान।
उसकी झपती-खुलती पलकों में छिपा
आखों का भोलापन
सहेजे होता है
दुनिया भर की आश्वस्ति,
हर किलकन में छिपी होती है
एक भरी हुई जिंदगी,
उँगलियों को फँसाकर
कुछ कहने की उसकी नादान सी कोशिश
दुनिया की सारी मुश्किलों का हल होती है।
रोजमर्रा की भाषिकी में
उलझी हुई जिंदगी के व्याकरण को
सही करती जाती है
उसकी निश्छल देहभाषा।
जब वो भींच लेता है
अपनी मुट्ठियों में मेरी उँगलियाँ.....
मतलब ये नही कि वो सहमा या कि शंकित है
बल्कि केवल यही कि
वो विश्वास भरता है मुझमे
अपने दाय को स्वीकारने का
और साथ ही
जैसे ले चलना चाहता है मुझे
अपनी मासूम सी दुनिया में
और निमंत्रित करता है
फिर से बच्चा बन जाने को....।

डॉ. आशुतोष राय
ग़ाज़ीपुर
मैं चाहता हूँ तुम उगो
मेरे दिल में
जैसे मिट्टी में अंखुआता बिरवा।
मैं चाहता हूँ तुम फैलो
मेरे अस्तित्व पर
जैसे भँवरे
ताल के सीने पर।
मैं चाहता हूँ
तुम गूँजो
वेद ऋचाओं सी
मेरे कानों में ;
क्योंकि तुम्हारा
उगना, फैलना, गूँजना
जरूरी है मेरे लिए
क्योंकि
तुम
मेरा अस्तित्व हो।

डॉ. आशुतोष राय
एक पागल की बड़बड़ाहट-2:

मैंने अपने घावों को छिपा दिया है कहीं कोने में, क्योंकि वो अब टीसती नही। जो टीसे नही, वह घाव नही। टीसना घाव होता है। अब मन स्थिर है। बर्फ की मानिंद। स्थिरता बर्फ होती है।
टीसना व्याकुल करती है। व्याकुलता बेचैन करती है। बेचैनी अस्थिरता होती है।मतलब टीसना अस्थिरता होती है।मतलब अस्थिरता घाव होती है और स्थिरता बर्फ होती है। तो मेरी यात्रा क्या रही : अस्थिरता से स्थिरता की ओर या टीस से बर्फ की और????

@आशुतोष राय

 एक पागल की बड़बड़ाहट-3:

दुनिया के हर शहर में कई मुहल्ले होते है। उन मुहल्लों में कई गलियां होती है और उन गलियों में, नुक्कड़ों पर कई मकान होते है और उन्ही मकानों के कमरे में बंद हर आदमी की एक कहानी होती है। अपनी आलोचना भी वह खुद ही होता है।

मैं भी ऐसी ही एक दुनिया के ऐसे ही एक मोहल्ले के ऐसी ही एक गली के ऐसे ही एक नुक्कड़  के ऐसे ही एक कमरे में रहता हुआ अपनी जिंदगी की आलोचना करता रहता हूँ। आलोचना को कविता में ढालता हूँ और कविता को गद्य में लिखते हुए गद्य, कविता और आलोचना के घालमेल से जिंदगी को गड्ड-मड्ड करता रहता हूँ। आलोचना है तो किताबें भी है, गद्य है तो विचार भी है और कविता है तो भाव भी। किताबें रैक में में पड़ी सीली हुई बदबू मार रही है,  विचार गोबर के घूरे में रेंगते गुबरैले की तरह दिमाग में कुलबुलाती है और भाव तालाब में सड़ते पानी के मानिंद दिल में बस्साती रहती है। जिंदगी आकाश में टँके सूरज और चाँद और तारों को पॉकेटमनी की तरह अपनी जेब में रखना चाहता है, पर मजबूर हूँ। इस छोटे से कमरें में इतनी जगह नही कि जिंदगी को इतना आवारा बनने की छूट दे पाऊँ। वह अपने आलोचना-गद्य-पद्य या कि सीली हुई बदबू-गुबरैला-सड़ांध पानी को ही सहेज ले, यही बहुत है।।।।।

@आशुतोष राय
एक पागल की बड़बड़ाहट--1

हर आदमी किसी न किसी चीज में ख़ुशी पाता है; या यों कह ले कि ख़ुशी पाने के छद्म को जीता है। मैं भी इससे अलग नही हूँ। कभी कविता को जीता हूँ तो कभी शब्द को तो कभी अर्थ को। पर सच कहूँ, अंदर से  थक जाता हूँ कविता के शब्दार्थों के रेशे अलग करने में।फिर झुँझलाकर छोड़ देता हूँ सब कुछ। मौन में ही भर पाने की असफल सी कोशिश....हर आह और वाह से दूर....खुद में डूबकर खुद को पाने की कोशिश करता हूँ। तब, बहुत धीरे धीरे मेरे भीतर संगीत सा उतरता है, बहुत कोमल, बहुत मधुर, जिसकी तान और लय में अंदर तक सीझता सा चला जाता हूँ मैं। तो क्या सच में मौन की अभिव्यंजना शब्द की अभिव्यंजना से ज्यादा मूर्तिमान है? जब भी कोई बेचैन सी कांपती हुई आवाज दिल की बावड़ी में छप से पड़ती है, शब्दों का झालर सा सज जाता है मेरे भीतर और उसके अर्थ भँवर दर भँवर एक दूसरे के ऊपर चढ़कर उलझते से चले जाते है। और इसी झालर की टिमटिमाहट में एक मसोसती हुई पीड़ा बाहर आकर हौले हौले अंदर की बेतरतीबी को सही करती जाती है जैसे भीतर का खौलता हुआ लावा बाहर आकर मन को थोड़ी ठण्ढक पहुंचा दे।

- आशुतोष राय
रात खूब नीले आसमान में
टँका चाँद
जैसे
नीला पट खींच
दुल्हनिया ने दिखाया हो
अपना श्वेत मुख
औ धुल गयी हो सम्पूर्ण धरती
मखमली चांदनी से ,
उधर बालों में टँका
सितारे का गोटा
लहरा उठा हो धवल आकाश में
जैसे चूमने को दुल्हनिया का मुख
फड़फड़ा रहा हो
बालों में बँधा
असफल सी कोशिश के साथ।।।

@आशुतोष राय