मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

कविते!
साधूँगा मैं तुम्हे;
शब्दों की समिधा को
लेखनी के स्रुवा में भर
पृष्ठों की वेदिका में
अर्पित करूँगा
और अर्थ का हविष्य बनाकर
करूँगा आह्वान
अक्षर-ब्रह्म का।
ध्वनि-मन्त्र विस्तरित होंगे मेरे
वायुपुत्रों के माध्यम से
स्फोट होगा
पूर्ण परात्पर अक्षर का
महदर्थ विस्तार में।
पद-मंत्र
उद्गिरित होंगे होता के मुख से-
परा से पश्यंती तक
पश्यंती से मध्यमा तक
और
मध्यमा से बैखरी तक।
इस सृजन यज्ञ का देवभाग
समर्पित है तुम्हे
सँभालो
इस मंत्र-पूत
अग्नि-स्तवित
पूर्ण परात्पर के अनुग्रह को-
मेरी कविता को....।।।

-आशुतोष राय

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