मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

कभी सोचा है
कितना असम्भव सा होता है
कोलकाता की गलियों में घूमते
नरेन के बचपन का
योद्धा संन्यासी विवेकानंद में बदलना?
पर बदला वह
साथ ही युग भी बदला
क्योंकि उस कच्चे घड़े को
हलके हलके थापा था
कालीबाड़ी के पुजारी ने,
उस निर्धन ब्राह्मण ने देखा था उसमे
एक नए भारत को जागते हुए
नया भारत नए योद्धा में ही साकार होगा।
उसने भी रौंद डाला पूरा भारत
और पूरा विश्व भी
अपने ज्ञान और तपःतेज से
एक योद्धा संन्यासी की तरह।
पुरखों की थाती को
थहाया था उसने,
बहुत गहरे डूब कर
समोया था खुद में
पूर्वजों का आशीर्वाद ।
काल प्रवाह को कर दिया था
स्वयं-मय।
वो आज भी है जीवित, पूजित, देवतुल्य..
पर ना, मैं नही चाहता उसे
देवता बनाना,
देवत्व दूर कर देगा उसे
मुझसे, तुमसे, हम सबसे
पूज्य बनकर पत्थर बन जायेगा नरेंद्र;
नर-इंद्र ही बना रहे वो,
आदमी की नस्ल में वो
मेरे और पास होगा,
मुझमे भरेगा विश्वास
दूसरा नर-इंद्र बनने का।
आज भी शून्य से निहार रहा है वो हमे
तलाश रहा है
दूसरे नर-इंद्र को,
एक और विश्व-विजय को।।।

-आशुतोष राय

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