मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

कहीं बहुत दूर
जंगल के उस पार
कांपती हुई क्षितिज में
डूब रही होती है मेरी नज़र,
ख्यालों के जंगल में
अँधेरे की पगडंडियां पकड़े
चल रहा होता हूँ मैं,
जंगल के बियाबान में
नर्म पत्तों की खामोश आवाजें
जाने क्या तो
हल्का सा खुरच जाती है दिल में,
बरसाती नदियां उलीचती है
अपने पाट का पानी:
मेरी आँखों से फूट पड़ते है सोते
औ' भींग जाता है मेरा पूरा अन्तस्;
तब सुरमई शाम औ'
सुनहले भोर का सपना तराशे
थकी आँखों के कोरों में
अटक जाती हो तुम
जैसे
टँक जाता है सूरज
पूरब में
पूरे लाल रंग के साथ....।

-आशुतोष राय

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