लिखकर एक आखर
पाता हूँ मैं एक आश्वस्ति
जैसे एक कसक निकल सी गयी हो,
थोड़ा सा भर जाता हूँ मैं
पूरेपन से
पाकर सटीक शब्द
अपने उफनते भाव के लिए,
लड़खड़ाते, बलखाते शब्द
गुथते चले जाते है वाक्य में-
जैसे छोटा बच्चा
पकड़कर मेरी तर्जनी
ठुमकता चलता हो
पूरे जमीन को
अपने पद-तल से दबाये,
शब्द बनते है पद
और पद से रिसता है
पदार्थ
जैसे गन्ने से रिसती है
उसकी मिठास
जैसे भोर प्राची से
छिटकती है उजास!
लिखकर एक छोटी सी कविता
निहाल हो जाता हूँ मैं
पा लेता हूँ खुद को
खुद में-
जीवन का एक दिन सफल हो जाता है...।
-आशुतोष राय
पाता हूँ मैं एक आश्वस्ति
जैसे एक कसक निकल सी गयी हो,
थोड़ा सा भर जाता हूँ मैं
पूरेपन से
पाकर सटीक शब्द
अपने उफनते भाव के लिए,
लड़खड़ाते, बलखाते शब्द
गुथते चले जाते है वाक्य में-
जैसे छोटा बच्चा
पकड़कर मेरी तर्जनी
ठुमकता चलता हो
पूरे जमीन को
अपने पद-तल से दबाये,
शब्द बनते है पद
और पद से रिसता है
पदार्थ
जैसे गन्ने से रिसती है
उसकी मिठास
जैसे भोर प्राची से
छिटकती है उजास!
लिखकर एक छोटी सी कविता
निहाल हो जाता हूँ मैं
पा लेता हूँ खुद को
खुद में-
जीवन का एक दिन सफल हो जाता है...।
-आशुतोष राय
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