मंगलवार, 6 दिसंबर 2016


जाड़े की धूप को चेहरे पर महसूसना;
स्नेही को
भर अँकवार समेट लेने की
असफल सी कोशिश
या
मन के प्याले में
ख़ुशी के जाम
का छलक जाना है।

डॉ आशुतोष राय

ठंढ की अलसाई सी सुबह में,
धूप की नर्मी
और लिहाफ की गरमाई में
भोर की उजास सा मन में भरता;
कोई धीरे से कान में
एक मल्हार तान छेड़ता;
'मैं' की सत्ता से अलग हो
सबमे समाहित सबकुछ समाहित
समिधा बन जाने का स्वप्न
है राग प्यार भरता।।।

डॉ. आशुतोष राय

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