ताल का पानी
बसा नैनो में पिया का अक्स
बादल - कि जैसे उतर पड़ा हो गलबहियां करने को
अपनी दुल्हनिया से।
उधर ताल
लहरों के चप्पू चलाकर
खे रहा है
अपने यौवन को
प्रिय के सुहाग में मदमाती सी
किनारे खड़े पेड़ों की चुहल पर
लजाती शर्माती
खुद में सिमट जाती,
पाकर बादलों की छाँव
भंवर बनकर
फ़ैल जाती किनारे तक;
पाकर तट कूल का कन्धा
टिका कर अपना श्लथ देह भार
खींच लेती है बादलों को
अपने देह पर...
और निहाल हो जाता है बादल
इस अनकही, अनछुई
तप्त प्रेम का परस पाकर....।।।
-डॉ आशुतोष राय
बसा नैनो में पिया का अक्स
बादल - कि जैसे उतर पड़ा हो गलबहियां करने को
अपनी दुल्हनिया से।
उधर ताल
लहरों के चप्पू चलाकर
खे रहा है
अपने यौवन को
प्रिय के सुहाग में मदमाती सी
किनारे खड़े पेड़ों की चुहल पर
लजाती शर्माती
खुद में सिमट जाती,
पाकर बादलों की छाँव
भंवर बनकर
फ़ैल जाती किनारे तक;
पाकर तट कूल का कन्धा
टिका कर अपना श्लथ देह भार
खींच लेती है बादलों को
अपने देह पर...
और निहाल हो जाता है बादल
इस अनकही, अनछुई
तप्त प्रेम का परस पाकर....।।।
-डॉ आशुतोष राय
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