मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

ऐसी ख़ुशी मन की-

बूँद की सिहरन;
कि जैसे तुम्हारी छुअन का कम्प
मानो दहकते सूर्य को समेटे
बादल का टुकड़ा।
धुले पत्ते की चमक;
तुम्हारे चेहरे से बिछलती आँखों की शीतलता
मानो अन्तर की चट्टान पर गिरती
झरने की धार।
मिट्टी की सोंधी गमक;
मानो तुम्हारे होने की गंध
जैसे जिस्म की गंध हवा में
तार तार उड़ी जाती हो।
इन फुहारों की ख़ुशी को समेटना;
जैसे तुम्हे पूरा पाने की कोशिश
पर हर बार जैसे
कुछ छूट छूट सा जाता है।
बादलों का गरजना;
वक सुप्त सा भय
कि जैसे दूर घाटियों में गूंजती आवाज़े
पास...
होकर भी बहुत दूर
तुम्हारी आवाज़ का दूर....दूरतर होते जाना।
तुम्हारे मन की किलकन;
जैसे नदी तालो में जलपक्षियों की फुदकी,
या कि जैसे बालमन की
खेतों, आँगन की छपछप-
ऐसी ख़ुशी मन की।।।

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