मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

एक क्षणिका--

शाम
घोलती है खुद को
रात के अंधेरों में
ताकि घुला सके
अपनी आभा
उषा की लालिमा में;
घुलकर ही
पाती है स्वयं को
एक नए विस्तार में।।।।

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