मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

कभी देखी है
बच्चे की दुधमुही मुस्कान?
मासूम सी होठों की थिरकन में
घुली होती है जिंदगी की मिठास,
 बंद मुट्ठियों में भरे होता है
वह पूरा आसमान।
उसकी झपती-खुलती पलकों में छिपा
आखों का भोलापन
सहेजे होता है
दुनिया भर की आश्वस्ति,
हर किलकन में छिपी होती है
एक भरी हुई जिंदगी,
उँगलियों को फँसाकर
कुछ कहने की उसकी नादान सी कोशिश
दुनिया की सारी मुश्किलों का हल होती है।
रोजमर्रा की भाषिकी में
उलझी हुई जिंदगी के व्याकरण को
सही करती जाती है
उसकी निश्छल देहभाषा।
जब वो भींच लेता है
अपनी मुट्ठियों में मेरी उँगलियाँ.....
मतलब ये नही कि वो सहमा या कि शंकित है
बल्कि केवल यही कि
वो विश्वास भरता है मुझमे
अपने दाय को स्वीकारने का
और साथ ही
जैसे ले चलना चाहता है मुझे
अपनी मासूम सी दुनिया में
और निमंत्रित करता है
फिर से बच्चा बन जाने को....।

डॉ. आशुतोष राय
ग़ाज़ीपुर

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