एक पागल की बड़बड़ाहट-2:
मैंने अपने घावों को छिपा दिया है कहीं कोने में, क्योंकि वो अब टीसती नही। जो टीसे नही, वह घाव नही। टीसना घाव होता है। अब मन स्थिर है। बर्फ की मानिंद। स्थिरता बर्फ होती है।
टीसना व्याकुल करती है। व्याकुलता बेचैन करती है। बेचैनी अस्थिरता होती है।मतलब टीसना अस्थिरता होती है।मतलब अस्थिरता घाव होती है और स्थिरता बर्फ होती है। तो मेरी यात्रा क्या रही : अस्थिरता से स्थिरता की ओर या टीस से बर्फ की और????
@आशुतोष राय
एक पागल की बड़बड़ाहट-3:
दुनिया के हर शहर में कई मुहल्ले होते है। उन मुहल्लों में कई गलियां होती है और उन गलियों में, नुक्कड़ों पर कई मकान होते है और उन्ही मकानों के कमरे में बंद हर आदमी की एक कहानी होती है। अपनी आलोचना भी वह खुद ही होता है।
मैं भी ऐसी ही एक दुनिया के ऐसे ही एक मोहल्ले के ऐसी ही एक गली के ऐसे ही एक नुक्कड़ के ऐसे ही एक कमरे में रहता हुआ अपनी जिंदगी की आलोचना करता रहता हूँ। आलोचना को कविता में ढालता हूँ और कविता को गद्य में लिखते हुए गद्य, कविता और आलोचना के घालमेल से जिंदगी को गड्ड-मड्ड करता रहता हूँ। आलोचना है तो किताबें भी है, गद्य है तो विचार भी है और कविता है तो भाव भी। किताबें रैक में में पड़ी सीली हुई बदबू मार रही है, विचार गोबर के घूरे में रेंगते गुबरैले की तरह दिमाग में कुलबुलाती है और भाव तालाब में सड़ते पानी के मानिंद दिल में बस्साती रहती है। जिंदगी आकाश में टँके सूरज और चाँद और तारों को पॉकेटमनी की तरह अपनी जेब में रखना चाहता है, पर मजबूर हूँ। इस छोटे से कमरें में इतनी जगह नही कि जिंदगी को इतना आवारा बनने की छूट दे पाऊँ। वह अपने आलोचना-गद्य-पद्य या कि सीली हुई बदबू-गुबरैला-सड़ांध पानी को ही सहेज ले, यही बहुत है।।।।।
@आशुतोष राय
एक पागल की बड़बड़ाहट--1
हर आदमी किसी न किसी चीज में ख़ुशी पाता है; या यों कह ले कि ख़ुशी पाने के छद्म को जीता है। मैं भी इससे अलग नही हूँ। कभी कविता को जीता हूँ तो कभी शब्द को तो कभी अर्थ को। पर सच कहूँ, अंदर से थक जाता हूँ कविता के शब्दार्थों के रेशे अलग करने में।फिर झुँझलाकर छोड़ देता हूँ सब कुछ। मौन में ही भर पाने की असफल सी कोशिश....हर आह और वाह से दूर....खुद में डूबकर खुद को पाने की कोशिश करता हूँ। तब, बहुत धीरे धीरे मेरे भीतर संगीत सा उतरता है, बहुत कोमल, बहुत मधुर, जिसकी तान और लय में अंदर तक सीझता सा चला जाता हूँ मैं। तो क्या सच में मौन की अभिव्यंजना शब्द की अभिव्यंजना से ज्यादा मूर्तिमान है? जब भी कोई बेचैन सी कांपती हुई आवाज दिल की बावड़ी में छप से पड़ती है, शब्दों का झालर सा सज जाता है मेरे भीतर और उसके अर्थ भँवर दर भँवर एक दूसरे के ऊपर चढ़कर उलझते से चले जाते है। और इसी झालर की टिमटिमाहट में एक मसोसती हुई पीड़ा बाहर आकर हौले हौले अंदर की बेतरतीबी को सही करती जाती है जैसे भीतर का खौलता हुआ लावा बाहर आकर मन को थोड़ी ठण्ढक पहुंचा दे।
- आशुतोष राय
मैंने अपने घावों को छिपा दिया है कहीं कोने में, क्योंकि वो अब टीसती नही। जो टीसे नही, वह घाव नही। टीसना घाव होता है। अब मन स्थिर है। बर्फ की मानिंद। स्थिरता बर्फ होती है।
टीसना व्याकुल करती है। व्याकुलता बेचैन करती है। बेचैनी अस्थिरता होती है।मतलब टीसना अस्थिरता होती है।मतलब अस्थिरता घाव होती है और स्थिरता बर्फ होती है। तो मेरी यात्रा क्या रही : अस्थिरता से स्थिरता की ओर या टीस से बर्फ की और????
@आशुतोष राय
एक पागल की बड़बड़ाहट-3:
दुनिया के हर शहर में कई मुहल्ले होते है। उन मुहल्लों में कई गलियां होती है और उन गलियों में, नुक्कड़ों पर कई मकान होते है और उन्ही मकानों के कमरे में बंद हर आदमी की एक कहानी होती है। अपनी आलोचना भी वह खुद ही होता है।
मैं भी ऐसी ही एक दुनिया के ऐसे ही एक मोहल्ले के ऐसी ही एक गली के ऐसे ही एक नुक्कड़ के ऐसे ही एक कमरे में रहता हुआ अपनी जिंदगी की आलोचना करता रहता हूँ। आलोचना को कविता में ढालता हूँ और कविता को गद्य में लिखते हुए गद्य, कविता और आलोचना के घालमेल से जिंदगी को गड्ड-मड्ड करता रहता हूँ। आलोचना है तो किताबें भी है, गद्य है तो विचार भी है और कविता है तो भाव भी। किताबें रैक में में पड़ी सीली हुई बदबू मार रही है, विचार गोबर के घूरे में रेंगते गुबरैले की तरह दिमाग में कुलबुलाती है और भाव तालाब में सड़ते पानी के मानिंद दिल में बस्साती रहती है। जिंदगी आकाश में टँके सूरज और चाँद और तारों को पॉकेटमनी की तरह अपनी जेब में रखना चाहता है, पर मजबूर हूँ। इस छोटे से कमरें में इतनी जगह नही कि जिंदगी को इतना आवारा बनने की छूट दे पाऊँ। वह अपने आलोचना-गद्य-पद्य या कि सीली हुई बदबू-गुबरैला-सड़ांध पानी को ही सहेज ले, यही बहुत है।।।।।
@आशुतोष राय
एक पागल की बड़बड़ाहट--1
हर आदमी किसी न किसी चीज में ख़ुशी पाता है; या यों कह ले कि ख़ुशी पाने के छद्म को जीता है। मैं भी इससे अलग नही हूँ। कभी कविता को जीता हूँ तो कभी शब्द को तो कभी अर्थ को। पर सच कहूँ, अंदर से थक जाता हूँ कविता के शब्दार्थों के रेशे अलग करने में।फिर झुँझलाकर छोड़ देता हूँ सब कुछ। मौन में ही भर पाने की असफल सी कोशिश....हर आह और वाह से दूर....खुद में डूबकर खुद को पाने की कोशिश करता हूँ। तब, बहुत धीरे धीरे मेरे भीतर संगीत सा उतरता है, बहुत कोमल, बहुत मधुर, जिसकी तान और लय में अंदर तक सीझता सा चला जाता हूँ मैं। तो क्या सच में मौन की अभिव्यंजना शब्द की अभिव्यंजना से ज्यादा मूर्तिमान है? जब भी कोई बेचैन सी कांपती हुई आवाज दिल की बावड़ी में छप से पड़ती है, शब्दों का झालर सा सज जाता है मेरे भीतर और उसके अर्थ भँवर दर भँवर एक दूसरे के ऊपर चढ़कर उलझते से चले जाते है। और इसी झालर की टिमटिमाहट में एक मसोसती हुई पीड़ा बाहर आकर हौले हौले अंदर की बेतरतीबी को सही करती जाती है जैसे भीतर का खौलता हुआ लावा बाहर आकर मन को थोड़ी ठण्ढक पहुंचा दे।
- आशुतोष राय
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