मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

भोर के प्राची की
अनोखी अरुणाभ रेखा,
उधर विपरीत में
सहमी -सकुचाई,
झिलमिली धुंधलके का घूंघट डाले
कंचनजंगा।
उसे देखना जैसे
कोई नवोढ़ा वधू बैठी हो
प्रथम परस के
और घूंघट-पट खुलने के इंतज़ार में
हल्का संकोच और रोमांच भरे।
रवि का प्राची में
थोड़ा और ऊपर चढ़ना-
कि जैसे पूरी पूरब दिशा
खिंच गयी हो लाल पट्टी सी..।
थोड़ा और ऊपर-
अरुण क्षितिज के ऊपर से झांकता-
जैसे दहकते लाल भट्ठी से
उतर रहा हो स्वर्ण-गोलक,
या जैसे दूल्हे की बेचैन आँखे
हेर रही हो अपनी
दुल्हन की एक झलक को।
उधर कंचनजंगा के मांग में
भर रहा था वो सिंदूर;
राग और लज्जा से सिमटकर
वो होती जा रही थी और स्वर्णिम-
चोटी का माथा कंचन हो गया था।
अब सूरज चढ़ आया था ऊपर
अपनी रश्मियों के साथ,
उधर सुहाग से मदमाती
कंचनजंगा भी
हिम धवल श्वेत वसन पहने
निहाल थी अपने
अरुण-सुहाग को पाकर।।।।

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