मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

मुझे प्यार है अपनी कलम की रोशनाई से
आड़ी-बेड़ी रेखाओं से टँकी
कागजी पृष्ठों के तई
मैं देखता हूं नई दुनिया को;
झिलमिलाती, तारों टँकी आकाश के पार-
जहाँ अन्तस् का बहुत कोमल स्पर्श
दुलरा रहा होता है 'मैं' को।
भाव और भाषा के द्वैत में
अद्वैत को साधना -
शब्द घुलता है मेरे रूह में
जैसे श्वास घुलती है पूरे जिस्म में,
अर्थ छिटक जाती है मुझसे
जैसे खिलंदड़ी बच्चा
अचकचाकर छूट जाये हाथ से
मैं डरूँ औ' वो सामने खड़ा हो खिलखिलाये;
पर हर बार शब्द सहेजता है मुझे
थपकाकर, पुचकारकर और मेरा हाथ बनकर
फिर से लाती है उन अर्थ को
मुझतक खुद में समेटकर-
जैसे मेरे मंदिर के
शालिग्राम का चरणोदक
भर माथे लगाकर
कृतकृत्य हो जाता हूँ मैं।
ऐसे , शब्दों में
प्राणों को उलीचकर
रेखाओं- प्रतीकों के तई
अक्षर ब्रह्म तक पहुँचने की
कोशिश करता हूँ मैं।
इसलिए
साधता हूँ मैं शब्दों को
और हौले-हौले
 भरता जाता है मेरा हृदय
बेपनाह मोहब्बत से
अपनी कविता से।।।।

-आशुतोष राय

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